गांदरबल/श्रीनगर (Kheer Bhawani Mela 2026): जम्मू कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला स्थित माता खीर भवानी मंदिर में सोमवार को ज्येष्ठ अष्टमी के अवसर पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिला। वार्षिक खीर भवानी मेले में देश के अलग अलग हिस्सों, जम्मू कश्मीर और बाहर से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में हाजिरी लगाई। मेले में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित श्रद्धालु शामिल हुए, जिनके लिए यह पर्व आस्था, परंपरा और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव का अहम अवसर माना जाता है।
सुबह से ही तुलमुल्ला धाम में श्रद्धालुओं की आवाजाही तेज हो गई थी। मंदिर परिसर, पवित्र कुंड और दर्शन मार्गों पर भक्तों की लंबी कतारें नजर आईं। श्रद्धालु अपने साथ खीर, दूध, फूल और पूजा सामग्री लेकर पहुंचे और माता रज्ञा देवी के चरणों में अर्पित कर परिवार की सुख शांति, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। पूरे परिसर में भजन, पूजा-अर्चना और धार्मिक उल्लास का माहौल बना रहा।
इस मौके पर जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी माता खीर भवानी धाम पहुंचे। उन्होंने मंदिर में विधि विधान से पूजा की और प्रदेश में शांति, खुशहाली और सभी लोगों के कल्याण की प्रार्थना की। उपराज्यपाल ने मेले के दौरान श्रद्धालुओं के लिए किए गए इंतजामों का भी जायजा लिया। उनके दौरे के दौरान प्रशासनिक अधिकारी और सुरक्षा एजेंसियां भी पूरी तरह सक्रिय नजर आईं।
मेले को लेकर इस बार प्रशासन ने सुरक्षा और सुविधाओं के स्तर पर खास तैयारियां की थीं। तुलमुल्ला मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई, वहीं पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं, साफ सफाई, यातायात और ठहरने जैसी व्यवस्थाओं पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
खीर भवानी मेला कश्मीरी पंडित समुदाय के सबसे प्रमुख धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। यही वजह है कि हर साल ज्येष्ठ अष्टमी पर तुलमुल्ला धाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। यह मेला केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि विस्थापन और बदलते समय के बीच अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की भावना का भी प्रतीक बन चुका है। इस बार भी मंदिर में उमड़ी भीड़ ने साफ कर दिया कि माता खीर भवानी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था आज भी उतनी ही गहरी और मजबूत है।
तुलमुल्ला में आयोजित यह मेला जम्मू कश्मीर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की भी एक अहम तस्वीर पेश करता है। एक ओर जहां कश्मीरी पंडित समुदाय इसे अपनी पहचान और परंपरा से जोड़कर देखता है, वहीं दूसरी ओर यह आयोजन कश्मीर की साझा सांस्कृतिक स्मृति और आस्था के निरंतर बने रहने का भी संदेश देता है।
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