संसद में मोदी सरकार ने माना, नोटबंदी के प्रभावों पर नहीं किया रिसर्च

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नई दिल्ली: नोटबंदी को हुए 2 साल से ज्यादा वक्त हो गया है, लेकिन अभी भी नोटबंदी को लेकर विपक्षी पार्टियां केन्द्र सरकार को घेर रही हैं। दरअसल, विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि केन्द्र की मोदी सरकार ने नोटबंदी का फैसला लेने से पहले इसके प्रभावों पर ज्यादा विचार विमर्श नहीं किया था। अब लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में भी इस बात की पुष्टि हुई है। सरकार ने माना कि इसको लेकर पहले कोई रिसर्च नहीं किया गया था।

शुक्रवार को संसद की कार्यवाही के दौरान एक सवाल में पूछा गया कि था कि क्या सरकार ने नोटबंदी का फैसला करने से पहले इसके प्रभावों को लेकर कोई रिसर्च की थी? इसका जवाब केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री पी.राधाकृष्णन ने ‘ना’ के साथ दिया। बता दें कि 8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का फैसला किया था, जिसके तहत देश में 1000 और 500 के नोट एक झटके में चलन से बाहर हो गए थे। सरकार का मानना था कि इस फैसले से कालेधन पर नकेल कसी जा सकेगी।

नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक ने जो आंकड़े पेश किए थे, उनके मुताबिक सर्कुलेशन का 99.3% पैसा वापस बैंकों में पहुंच गया था। लोकसभा में इससे संबंधित भी सवाल किया गया, जिसके जवाब में वित्त राज्यमंत्री पी. राधाकृष्णन ने जो आंकड़े पेश किए उनके मुताबिक रिजर्व बैंक द्वारा 2017-18 में प्रकाशित कराए गए वार्षिक आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी के वक्त बाजार में 15,417.93 बिलियन 1000 और 500 के नोट चलन में थे। जिनमें से 15,310.73 बिलियन के प्रतिबंधित नोट वापस बैंकों में जमा हो गए थे।

विपक्षी पार्टियों के अलावा कई अर्थशास्त्रियों ने भी नोटबंदी के फैसले की आलोचना की थी। बीते दिनों केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने भी संसद की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी के सामने स्वीकार किया था कि नोटबंदी से किसानों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा है। मंत्रालय ने स्वीकार किया था कि नोटबंदी के कारण किसानों के सामने नगदी की समस्या पैदा हो गई थी, जिससे उन्हें फसल बोने के लिए बीजों और खाद आदि की व्यवस्था करने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था।

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