हिमालय दिवस 2018: क्या दिवस मनाने मात्र से होगा हिमालय संरक्षण!

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देहरादून: हिमालय के संरक्षण और उसे संवारने की जागरूकता के लिए पिछले कुछ वर्षों से देश भर और खासकर हिमालय क्षेत्र राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल, असम, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जा रहा है।

उत्तराखण्ड सहित अन्य हिमालयी राज्यों की सरकारें भले ही पूरे साल जल, जंगल, ज़मीन को नुकसान पहुँचाकर और भू, वन, रेता-बजरी माफ़िया को संरक्षण देकर पारिस्थितिकी और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले काम करती रहें, लेकिन 9 सितम्बर को हिमालय दिवस मनाना नहीं भूलती है।

पर्यावरणविदों, पर्यावरण प्रेमियों व समाजसेवियों का मानना है कि, हिमालय की चिंता सिर्फ बर्फ से लकदक चोटियां, हिमनद और नदियां ही नहीं है। बल्कि, हिमालय की संपूर्णता उस समाज, संस्कृति और परंपराओं से है, जो यहां बड़ी आबादी के तौर पर वास करती है। उसका सबसे पहला प्रहरी और चिंतक यहां बसने वाला समाज है। उसकी चिंता किए बगैर हिमालय की चिंता बेमानी है।

हिमालय दिवस की शुरुआत 2010 में एक पहल के रूप में शुरू हुई, जिसकी शुरुआत नामांकित पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं के एक समूह ने शुरू किया, जिसमे सुंदर लाल बहुगुणा, अनिल जोशी और राधा बेहान आदि थे।  हिमालय दिवस के द्वारा हिमालय के लिए सतत विकास और पारिस्थितिक स्थिरता और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाये रखने के लिए किया गया था। उत्तराखंड में हिमालय दिवस की शुरुआत आधिकारिक तौर पर 9 सितंबर, 2014 उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने की थी।

आज हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक जलश्रोत सूख रहे हैं, मौसम चक्र में निरंतर बदलाव हो रहा है, तमाम वनस्पतियां विलुप्त होने की कगार पर हैं, परिस्थितिकी में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाओं में भी इजाफा हो रहा है। यह सब इसका संकेत है कि हिमालय संकट में है। आज हालत यह है कि उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक तकरीबन एक हजार से अधिक बांध हिमालय क्षेत्रों में बन रहे हैं। पर्यटन और उद्योग के नाम पर अनियोजित विकास हो रहा है। बड़े बांध तो चुनौती बने ही हैं, हिमालय की जैव विविधता परभी खतरे का संकट मंडरा रहा है। इन बदलावों से सिर्फ प्रकृति ही नहीं, समाज भी प्रभावित हो रहा है। निसंदेह हिमालय खतरे में है। हिमालय को बचाया जाना भी जरूरी है। लेकिन अहम सवाल यह है कि यह बचेगा कैसे? कौन बचाएगा इसे?

वहीँ आज केंद्र सरकार या फिर राज्य सरकार एक ओर तो हिमालय बचाने और पलायन रोकने की बात करती है, लेकिन दूसरी ओर राज्य में प्रस्तावित सैकड़ों बांधों के चलते लाखों लोगों को विस्थापित करने की योजना बना रही है। जिससे लाखों एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो जाएगी और प्राकृतिक जड़ी-बूटियां, खनिज संपदा, वन संपदा नष्ट हो जाएंगे। जबकि बिजली उत्पादन से होने वाले लाभ से कहीं अधिक वन संपदा, कृषि भूमि, जड़ी-बूटियां अन्य खनिज पदार्थों के हमेशा के लिए लुप्त हो जाने का खतरा है। सरकारों का यह दोहरा रवैया भी हास्यास्पद है कि, एक तरफ तो वह हिमालय बचाने की बात करती हैं वही दूसरी और हिमालय को नष्ट करने का काम भी यही कर रही है। आज स्थिति यह हो गई है कि हिमालय को लेकर हिमालयी देशों से अधिक अन्तरराष्ट्रीय संगठन चिन्तित हो गए हैं।

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